Saturday, 10 November 2007

Бугенвилия у окна: одиннадцать стихотворений / खिड़की पर बोगनविला


(वह खिड़की और वह बोगनविला जिसे देखकर- "खिड़की पर बोगनविला ग्यारह कविताएँ" -लिखी गई)



1.
Утром ранним
раньше солнца
у окна
бугенвилия пробудилась
и зовет, раскрыв объятья
словно мать свое дитя.




2.
Бугенвилия в окне
колыхаясь, небо ловит
вносит в комнату его
изгоняя тьму наружу
свету облик новый дарит.



3.
Покрывало солнечных лучей
нежно комнату окутало, приоткрыв слегка окно
слившись с солнцем воедино
бугенвилия парит
в шар воздушный воплощаясь
воображение, собравшееся взлететь
притаилось в комнате.

4.
На стене
бугенвилия прячет солнышко
и словно белье на веревке, сушит небо
я свёртываю стихи
в странички
день проходит
медленно.

5.
Бугенвилия словно льется
и останавливается
на подоконнике
подглядывает в окошко
колыхается
резвится во дворе
размахивая руками, препятствует
окно улыбается


6.
У окна цветет бугенвилия
перешагнув окно
красоту на показ раскрывает
окно морщится
соперничать не в силах.


7.
В окне цветы
в цветах вся жизнь
бугенвилия заполняет
безмолвие стены.


8.
Цветет
бугенвилия
раскачиваются цветы радости
заливают радужную округу
завтра их не станет
как прекрасно, что
их радость
навечно будет жить и в других цветах
радость не остановится
у окна
в душе
в человеке
она кружится беспрерывно.



9.
Я тут
и бугенвилия
мы переговариваемся
смеемся, хохочем
окно молчит
лишь улыбается.


10.
Небо исчезло в ночи
уснул двор
задремали стены
потускнели ночные огоньки
бугенвилия не спит пока
что бы пожелать мне
спокойной ночи.

11.
У окна шелестит
ложится на бок бугенвилия
«пошли, уйдем к звездам»
«пруд, ты не спишь?»
«в небе безупречный лунный свет»
и мы поплыли
на лодочке-луне.
1.
सुबह सुबह
सबसे पहले उठती है बोगनविला
खिड़की के बाहर
बाँह फैलाकर बुलाती हुई
जैसे नन्हें बच्चे को
बुलाती है माँ
बोगनविला जागती है
सूरज से भी पहले

2.
खिड़की
बोगनविला को झुलाती है बाहों में
आकाश को पकड़ लाती है कमरे में
उजाले को देती है नई दिशाएँ
और
अंधेरे को बुहार कर फेंक देती है
बाहर

3.
खिड़की बिछाती है
कमरे में धूप की चादर
बोगनविला बाँधती है उसके ओर छोर
गर्म हवा के गुब्बारे की तरह
उड़ान को तैयार हो जाती है कल्पना
यों ही कमरे में बैठे

4.
धूप को
दीवार पर चिपकाती है बोगनविला
खिड़की तार पर आकाश सुखाती है
मैं कविताएँ तहाती हूँ
पन्नों में
दिन गुज़रता है
हौले

5.
बोगनविला झरते है
रुक कर ठहरते है
खिड़की की देहरी पर
उचक कर
उछलते हैं नीचे
भागते फिरते हैं आँगन में
डाली बाँह हिला हिला कर
बरजती है
खिड़की मुसकाती है

6.
खिड़की पर खिली है बोगनविला
उमगा है रूप का दरिया
खिड़की के पार है
सौंदर्य
खुलकर बिखरता हुआ
खिड़की भीतर
सिमटकर निखरता हुआ

7.
खिड़की में फूल हैं
फूलों में जीवन
दीवार के सन्नाटे को
भरती है
बोगनविला

8.
खिलती है
बोगनविला
झूमते हैं उल्लास के फूल
भरते हुए
रंग मौसम में
कल ये फूल ना भी रहें
उल्लास!
रहेगा फिर भी नित्य नए फूलों में
उल्लास रुकता नहीं
खिड़की के सम्मान में
आत्मा में
व्यक्तित्व में
निरंतर घुलता है
फूटकर झलकता है
खिड़की के सौंदर्य में

9.
मैं हूँ
खिड़की है
और बोगनविला
मैं और बोगनविला दोनो बतियाते है
हँसते खिलखिलाते हैं
खिड़की चुप रहती है
सिर्फ़ मुसकुराती है

10.
आसमान खो गया है रात में
सो गया है आँगन
ऊँघने लगी हैं दीवारें
धीमी पड़ गई है रात भर जलनेवाली बत्तियाँ
बोगनविला जागी है अबतक
मेरे सोने से पहले
कहने को
शुभ रात्रि

11.
खिड़की पर सरसराती
करवटें लेती है बोगनविला
“चलो नीहारिकाओं तक चलें...”
“जागी हो अभी तलक?”
”हाँ निर्मल चाँदनी जो है आकाश की राहों में”
और हम चल पड़े
चाँद की नाव पर

2 comments:

डॉ. दुष्यंत said...

taon ke bimb bahut man mohak hain
yanee dil fareb

डॉ. दुष्यंत said...

apkee kaveetaon ke bimb bahut man mohak hain
yanee dil fareb